सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी
सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी
चौपाई ४, दोहा १६३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी॥ भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई॥ ४ ॥
अर्थ
उसकी यह बात सुनकर और उसे नख से शिखा तक दुष्ट जानकर शत्रुघ्नजी झोंटा पकड़-पकड़कर उसे घसीटने लगे। तब दयानिधि भरतजी ने उसको छुड़ा दिया और दोनों भाई कौसल्याजी के पास गये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १६३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-शत्रुघ्न के अयोध्या आगमन और दशरथ-निधन व राम-वनगमन का शोक का वर्णन है।
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भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक