कैकेई हरषित एहि भाँती

चौपाई ३, दोहा १५९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

कैकेई हरषित एहि भाँती। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती॥ सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें॥ ३ ॥

अर्थ

कैकेयी ही इस तरह हर्षित दीखती है मानो भीलनी जंगल में आग लगाकर आनन्द में भर रही हो। पुत्र को सोचित और मन मारे देखकर वह पूछने लगी--हमारे नैहर में कुशल तो है?

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १५९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-शत्रुघ्न के अयोध्या आगमन और दशरथ-निधन व राम-वनगमन का शोक का वर्णन है।

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भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक