सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई
सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई
चौपाई १, दोहा १६३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई॥ तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई॥ १ ॥
अर्थ
माता की कुटिलता सुनकर शत्रुघ्नजी के सब अंग क्रोध से जल रहे हैं, पर कुछ वश नहीं चलता। उसी समय कुबरी वहाँ आई। उसने भाँति-भाँति के वस्त्र और आभूषण बनाकर (पहनकर) रखे थे।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १६३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-शत्रुघ्न के अयोध्या आगमन और दशरथ-निधन व राम-वनगमन का शोक का वर्णन है।
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भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक