चले समीर बेग हय हाँके

चौपाई १, दोहा १५८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके॥ हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई॥ १ ॥

अर्थ

हवाके समान वेगवाले घोड़ोंको हाँकते हुए वे विकट नदी, पहाड़ तथा जंगलोंको लाँघते हुए चले। उनके हृदय में बड़ा सोच था, कुछ सुहाता न था। मन में ऐसा सोचते थे कि उड़कर पहुँच जाऊँ।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १५८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-शत्रुघ्न के अयोध्या आगमन और दशरथ-निधन व राम-वनगमन का शोक का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक