बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति
चौपाई १, दोहा १६१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति॥ तात राउ नहिं सोचै जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू॥ १ ॥
अर्थ
पुत्र को व्याकुल देखकर कैकेयी समझाने लगी। मानो जले पर नमक लगा रही हो। [वह बोली--] हे तात! राजा सोच करने योग्य नहीं हैं। उन्होंने पुण्य और यश कमाकर उसका पर्याप्त भोग किया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १६१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-शत्रुघ्न के अयोध्या आगमन और दशरथ-निधन व राम-वनगमन का शोक का वर्णन है।
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भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक