सरल सुसील धरम रत राऊ

चौपाई ३, दोहा १६२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ॥ अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ

फिर राजा तो सीधे, सुशील और धर्मपरायण थे। वे भला, स्त्री-स्वभाव को कैसे जानते? और, जगत् के जीव-जन्तुओं में ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजी प्राणों के समान प्यारे नहीं हैं?

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १६२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-शत्रुघ्न के अयोध्या आगमन और दशरथ-निधन व राम-वनगमन का शोक का वर्णन है।

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भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक