सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू

चौपाई ३, दोहा १६१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू॥ धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापिनि सबहि भाँति कुल नासा॥ ३ ॥

अर्थ

राजकुमार भरतजी यह सुनकर बहुत ही सहम गये। मानो पके घाव पर अँगार छू गया हो। उन्होंने धीरज धरकर बड़ी लंबी साँस लेते हुए कहा--पापिनी ! तूने सभी तरह से कुल का नाश कर दिया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १६१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-शत्रुघ्न के अयोध्या आगमन और दशरथ-निधन व राम-वनगमन का शोक का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक