चलत न देखन पायउँ तोही

चौपाई ३, दोहा १६० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही॥ बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी॥ ३ ॥

अर्थ

[और विलाप करने लगे कि] हे तात! मैं आपको [स्वर्ग जाते समय] चलते हुए देख भी न सका। [हाय!] आप मुझे श्रीरामजी को सौंप भी नहीं गये! फिर धीरज धरकर वे सँभलकर उठे और बोले--माता! पिताके मरने का कारण तो बताओ।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १६० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-शत्रुघ्न के अयोध्या आगमन और दशरथ-निधन व राम-वनगमन का शोक का वर्णन है।

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भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक