पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवँहिं
पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवँहिं
दोहा १५८ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं। भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं॥ १५८ ॥
अर्थ
नगर के लोग मिलते हैं, पर कुछ कहते नहीं; चुपके से जोहार करके चले जाते हैं। भरतजी भी किसी से कुशल नहीं पूछ सकते, क्योंकि उनके मन में भय और विषाद छा रहा है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक” प्रकरण का दोहा १५८ है। इस प्रकरण में भरत-शत्रुघ्न के अयोध्या आगमन और दशरथ-निधन व राम-वनगमन का शोक का वर्णन है।
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भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक