हाट बाट नहिं जाइ निहारी

चौपाई १, दोहा १५९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी॥ आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि॥ १ ॥

अर्थ

बाजार और रास्ते देखे नहीं जाते। मानो नगर में दसों दिशाओं में दावानल लगी है! पुत्र को आते सुनकर सूर्यकुलरूपी कमल के लिए चाँदनीरूपी कैकेयी [बड़ी] हर्षित हुई।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १५९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-शत्रुघ्न के अयोध्या आगमन और दशरथ-निधन व राम-वनगमन का शोक का वर्णन है।

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भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक