भूपँ प्रतीति तोरि किमि कीन्ही
भूपँ प्रतीति तोरि किमि कीन्ही
चौपाई २, दोहा १६२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भूपँ प्रतीति तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही॥ बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी॥ २ ॥
अर्थ
राजाने तेरा विश्वास कैसे कर लिया? [जान पड़ता है,] विधाता ने मरने के समय उनकी बुद्धि हर ली थी। विधि भी नारी के हृदय की गति नहीं जान सके। वह सम्पूर्ण कपट, पाप और अवगुणों की खान है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १६२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-शत्रुघ्न के अयोध्या आगमन और दशरथ-निधन व राम-वनगमन का शोक का वर्णन है।
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भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक