श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई

चौपाई २, दोहा ३७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई॥ सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन॥ २ ॥

अर्थ

आपने भी अपने श्रीमुख से उनकी बड़ाई की है और उन पर प्रभु (आप) का प्रेम भी बहुत है। हे प्रभो! मैं उनके लक्षण सुनना चाहता हूँ। आप कृपा के समुद्र हैं और गुण तथा ज्ञान में अत्यन्त निपुण हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “भरत का प्रश्न, राम का उपदेश” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा भरतजी के प्रश्न और राम के धर्म, भक्ति तथा संत-असंत-विवेक के उपदेश का वर्णन है।

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भरत का प्रश्न, राम का उपदेश