जोरि पानि कह तब हनुमंता

चौपाई ३, दोहा ३६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता॥ नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं॥ ३ ॥

अर्थ

तब हनुमानजी हाथ जोड़कर बोले--हे दीनदयालु भगवान्‌! सुनिये। हे नाथ! भरतजी कुछ पूछना चाहते हैं, पर प्रश्न करते मन में सकुचा रहे हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “भरत का प्रश्न, राम का उपदेश” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा भरतजी के प्रश्न और राम के धर्म, भक्ति तथा संत-असंत-विवेक के उपदेश का वर्णन है।

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भरत का प्रश्न, राम का उपदेश