श्रीरामजी का प्रजा को उपदेश (श्रीरामगीता), पुरवासियों की कृतज्ञता
श्रीरामजी प्रजा को धर्म, वैराग्य और भक्ति से युक्त जीवन का उपदेश देते हैं, जिसे श्रीरामगीता के रूप में स्मरण किया जाता है। पुरवासी श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ प्रभु के वचनों को स्वीकार करते हैं।
उत्तरकाण्ड · प्रकरण ९ / २१
प्रकरण पाठ
सुनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी॥ नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई॥ २ ॥
अर्थ:
हे समस्त नगरवासियो! मेरी बात सुनिये। यह बात मैं हृदय में कुछ ममता लाकर नहीं कहता हूँ। न अनीति की बात कहता हूँ और न इसमें कुछ प्रभुता ही है। इसलिये [संकोच और भय छोड़कर, ध्यान देकर] मेरी बातों को सुन लो और [फिर] यदि तुम्हें अच्छी लगे, तो उसके अनुसार करो!
बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥ साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥ ४ ॥
अर्थ:
बड़े भाग्य से यह मनुष्य शरीर मिला है। सब ग्रन्थों ने यही कहा है कि यह शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है (कठिनता से मिलता है)। यह साधन का धाम और मोक्ष का द्वार है। इसे पाकर भी जिसने परलोक न सँवारा,
एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥ नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥ १ ॥
अर्थ:
हे भाई! इस शरीर के प्राप्त होने का फल विषयभोग नहीं है। [इस जगत् के भोगों की तो बात ही क्या] स्वर्ग का भोग भी बहुत थोड़ा है और अन्त में दुःख देनेवाला है। अतः जो लोग मनुष्य शरीर पाकर विषयों में मन लगा देते हैं, वे मूर्ख अमृत को बदलकर विष लेते हैं।
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई॥ आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी॥ २ ॥
अर्थ:
जो पारसमणि को खोकर बदले में गुंजा ले लेता है, उसको कभी कोई भला (बुद्धिमान्) नहीं कहता। यह अविनाशी जीव [अण्डज, स्वेदज, जरायुज और उद्भिज्ज] चार खानों और चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाता रहता है।
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥ करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा॥ ४ ॥
अर्थ:
यह मनुष्य का शरीर भवसागर [से तारने] के लिए बेड़ा (जहाज) है। मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है। सद्गुरु इस मजबूत जहाज के कर्णधार (खेनेवाले) हैं। इस प्रकार दुर्लभ (कठिनता से मिलनेवाले) साधन सुलभ होकर (भगवत्कृपा से सहज ही) उसे प्राप्त हो गये हैं,
जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन हृदयँ दृढ़ गहहू॥ सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई॥ १ ॥
अर्थ:
यदि परलोक में और यहाँ दोनों जगह सुख चाहते हो, तो मेरे वचन सुनकर उन्हें हृदय में दृढ़ता से पकड़ रखो। हे भाई! यह मेरी भक्ति का मार्ग सुलभ और सुखदायक है, पुराणों और वेदों ने इसे गाया है।
ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका॥ करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ॥ २ ॥
अर्थ:
ज्ञान अगम (दुर्गम) है, [और] उसकी प्राप्ति में अनेक विघ्न हैं। उसका साधन कठिन है और उसमें मन के लिए कोई आधार नहीं है। बहुत कष्ट करने पर कोई उसे पा भी लेता है, तो वह भी भक्तिरहित होने से मुझको प्रिय नहीं होता।
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥ पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता॥ ३ ॥
अर्थ:
भक्ति स्वतन्त्र है और सब सुखों की खान है। परन्तु सतसंग (संतों के संग) के बिना प्राणी इसे नहीं पा सकते। और पुण्य-समूह के बिना संत नहीं मिलते। सतसंगति ही संसृति (जन्म-मरण के चक्र) का अन्त करती है।
पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा॥ सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा॥ ४ ॥
अर्थ:
जगत् में पुण्य एक ही है, [उसके समान] दूसरा नहीं। वह है--मन, कर्म और वचन से ब्राह्मणों के चरणों की पूजा करना। जो कपट का त्याग करके ब्राह्मणों की सेवा करता है, उस पर मुनि और देवता प्रसन्न रहते हैं।
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा॥ सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई॥ १ ॥
अर्थ:
कहो तो, भक्तिमार्ग में कौन-सा परिश्रम है? इसमें न योग की आवश्यकता है, न यज्ञ, जप, तप और उपवास की! [यहाँ इतना ही आवश्यक है कि] सरल स्वभाव हो, मन में कुटिलता न हो और जो कुछ मिले उसी में सदा संतोष रखे।
मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा॥ बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई॥ २ ॥
अर्थ:
मेरा दास कहलाकर यदि कोई मनुष्यों की आशा करता है, तो तुम्हीं कहो, उसका क्या विश्वास है? (अर्थात् उसकी मुझ पर आस्था बहुत ही निर्बल है।) बहुत बात बढ़ाकर क्या कहूँ? हे भाइयो! मैं तो इसी आचरण के वश में हूँ।
बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा॥ अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी॥ ३ ॥
अर्थ:
न किसी से वैर करे, न लड़ाई-झगड़ा करे, न आशा रखे, न भय ही करे। उसके लिए सभी दिशाएँ सदा सुखमयी हैं। जो कोई भी आरम्भ (फल की इच्छा से कर्म) नहीं करता, जिसका कोई अपना घर नहीं है (जिसकी घर में ममता नहीं है), जो मानहीन, पापहीन और क्रोधहीन है, जो [भक्ति करने में] निपुण और विज्ञानी है।
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा॥ भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई॥ ४ ॥
अर्थ:
जिसे सदा सज्जनों के संसर्ग से प्रीति है, जिसके मन में सब विषय, यहाँ तक कि स्वर्ग और अपवर्ग भी [भक्ति के सामने] तृण के समान हैं, जो भक्ति के पक्ष में हठ करता है, पर [दूसरे के मत का खण्डन करने की] मूर्खता नहीं करता तथा जिसने सब दुष्ट तर्कों को दूर बहा दिया है।
तनु धनु धाम राम हितकारी। सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी॥ असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ॥ २ ॥
अर्थ:
और हे शरणागत के दुःख हरनेवाले रामजी! आप ही हमारे शरीर, धन, घर-द्वार और सभी प्रकार से हित करनेवाले हैं। ऐसी शिक्षा आपके अतिरिक्त कोई नहीं दे सकता। माता-पिता [हितैषी हैं और शिक्षा भी देते हैं], परन्तु वे भी स्वार्थपरायण हैं [इसलिये ऐसी परम हितकारी शिक्षा नहीं देते]।
हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥ स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
हे असुरों के शत्रु! जगत् में बिना हेतु के (निःस्वार्थ) उपकार करनेवाले तो दो ही हैं—एक आप, दूसरे आपके सेवक। जगत् में [शेष] सभी स्वार्थ के मीत हैं। हे प्रभो! उनमें स्वप्न में भी परमार्थ का भाव नहीं है।