संत असंत भेद बिलगाई

चौपाई ३, दोहा ३७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई॥ संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता॥ ३ ॥

अर्थ

हे शरणागत का पालन करनेवाले! संत और असंत के भेद अलग-अलग करके मुझको समझाकर कहिये। [श्रीरामजी ने कहा--] हे भाई! संतों के लक्षण (गुण) असंख्य हैं, जो वेद और पुराणों में प्रसिद्ध हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “भरत का प्रश्न, राम का उपदेश” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा भरतजी के प्रश्न और राम के धर्म, भक्ति तथा संत-असंत-विवेक के उपदेश का वर्णन है।

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भरत का प्रश्न, राम का उपदेश