सनकादिक नारदहि सराहहिं

चौपाई ४, दोहा ४२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं॥ सुनि गुन गान समाधि बिसारी। सादर सुनहिं परम अधिकारी॥ ४ ॥

अर्थ

सनकादि मुनि नारदजी की सराहना करते हैं। यद्यपि वे (सनकादि) मुनि ब्रह्मनिष्ठ हैं, परन्तु श्रीरामजी का गुणगान सुनकर वे भी अपनी ब्रह्मसमाधि को भूल जाते हैं और आदरपूर्वक उसे सुनते हैं। वे [रामकथा सुनने के] श्रेष्ठ अधिकारी हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “भरत का प्रश्न, राम का उपदेश” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा भरतजी के प्रश्न और राम के धर्म, भक्ति तथा संत-असंत-विवेक के उपदेश का वर्णन है।

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भरत का प्रश्न, राम का उपदेश