सुनहु तात माया कृत गुन अरु
सुनहु तात माया कृत गुन अरु
दोहा ४१ · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक। गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक॥ ४१ ॥
अर्थ
हे तात! सुनो, माया से रचे हुए ही अनेक (सब) गुण और दोष हैं (इनकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है)। गुण यह है कि दोनों ही न देखे जायँ, इन्हें देखना ही अविवेक है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भरत का प्रश्न, राम का उपदेश” प्रकरण का दोहा ४१ है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा भरतजी के प्रश्न और राम के धर्म, भक्ति तथा संत-असंत-विवेक के उपदेश का वर्णन है।
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भरत का प्रश्न, राम का उपदेश