नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ
नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ
दोहा ३६ · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह। केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह॥ ३६ ॥
अर्थ
हे नाथ! न तो मुझे कुछ सन्देह है और न स्वप्न में भी शोक और मोह है। हे कृपा और आनन्द के समूह ! यह केवल आपकी ही कृपा का फल है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भरत का प्रश्न, राम का उपदेश” प्रकरण का दोहा ३६ है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा भरतजी के प्रश्न और राम के धर्म, भक्ति तथा संत-असंत-विवेक के उपदेश का वर्णन है।
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भरत का प्रश्न, राम का उपदेश