कोमलचित दीनन्ह पर दाया
कोमलचित दीनन्ह पर दाया
चौपाई २, दोहा ३८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया॥ सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी॥ २ ॥
अर्थ
उनका चित्त बड़ा कोमल होता है। वे दीनों पर दया करते हैं तथा मन, वचन और कर्म से मेरी निष्कपट (विशुद्ध) भक्ति करते हैं। सब को सम्मान देते हैं, पर स्वयं मान रहित होते हैं। हे भरत! वे प्राणी (संतजन) मेरे प्राणों के समान हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भरत का प्रश्न, राम का उपदेश” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा भरतजी के प्रश्न और राम के धर्म, भक्ति तथा संत-असंत-विवेक के उपदेश का वर्णन है।
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भरत का प्रश्न, राम का उपदेश