नर सरीर धरि जे पर पीरा
नर सरीर धरि जे पर पीरा
चौपाई २, दोहा ४१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा॥ करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना॥ २ ॥
अर्थ
मनुष्य का शरीर धारण करके जो लोग दूसरों को दुःख पहुँचाते हैं, उनको जन्म-मृत्यु के महान् संकट सहने पड़ते हैं। मनुष्य मोहवश स्वार्थपरायण होकर अनेकों पाप करते हैं, इसी से उनका परलोक नष्ट होता है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भरत का प्रश्न, राम का उपदेश” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा भरतजी के प्रश्न और राम के धर्म, भक्ति तथा संत-असंत-विवेक के उपदेश का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत का प्रश्न, राम का उपदेश