जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान

दोहा ४२ · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान। जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान॥ ४२ ॥

अर्थ

जीवन्मुक्त और ब्रह्मपरायण पुरुष भी ध्यान छोड़कर चरित सुनते हैं। जो हरि की कथा में रति नहीं करते, उनके हृदय [सचमुच ही] पत्थर [के समान] हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “भरत का प्रश्न, राम का उपदेश” प्रकरण का दोहा ४२ है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा भरतजी के प्रश्न और राम के धर्म, भक्ति तथा संत-असंत-विवेक के उपदेश का वर्णन है।

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भरत का प्रश्न, राम का उपदेश