करउँ कृपानिधि एक ढिठाई

चौपाई १, दोहा ३७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई॥ संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई॥ १ ॥

अर्थ

तथापि हे कृपानिधान! मैं आपसे एक धृष्टता करता हूँ। मैं सेवक हूँ और आप सेवक को सुख देनेवाले हैं [इससे मेरी धृष्टताको क्षमा कीजिये और मेरे प्रश्न का उत्तर देकर सुख दीजिये]। हे रघुनाथजी! वेद-पुराणों ने संतों की महिमा बहुत प्रकार से गायी है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “भरत का प्रश्न, राम का उपदेश” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा भरतजी के प्रश्न और राम के धर्म, भक्ति तथा संत-असंत-विवेक के उपदेश का वर्णन है।

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भरत का प्रश्न, राम का उपदेश