तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ
तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ
चौपाई ४, दोहा ३६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ॥ सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना॥ ४ ॥
अर्थ
[भगवान ने कहा--] हनुमानजी! तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो। भरत और मुझमें कुछ भी अन्तर है क्या? प्रभु के वचन सुनकर भरतजी ने उनके चरण पकड़ लिये [और कहा--] हे नाथ! हे शरणागत की पीड़ा हरनेवाले! सुनिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भरत का प्रश्न, राम का उपदेश” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा भरतजी के प्रश्न और राम के धर्म, भक्ति तथा संत-असंत-विवेक के उपदेश का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत का प्रश्न, राम का उपदेश