समुद्र के इस पार आना, सब का लौटना, मधुवन प्रवेश, सुग्रीव मिलन, श्रीराम-हनुमान संवाद
हनुमानजी समुद्र पार लौटकर वानर दल से मिलते हैं, और सब मिलकर आनंदपूर्वक मधुवन में प्रवेश करते हैं। सुग्रीव और फिर श्रीरामजी के समक्ष हनुमानजी सीताजी का समाचार, चूड़ामणि और उनका संदेश प्रस्तुत करते हैं।
सुन्दरकाण्ड · प्रकरण १२ / २०
प्रकरण पाठ
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥ नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥ १ ॥
अर्थ:
चलते समय उन्होंने महाध्वनि से भारी गर्जन किया, जिसे सुनकर राक्षसों की स्त्रियों के गर्भ गिरने लगे। समुद्र लाँघकर वे इस पार आये और उन्होंने वानरों को किलकिला शब्द (हर्षध्वनि) सुनाया।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥ मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥ २ ॥
अर्थ:
हनुमानजी को देखकर सब हर्षित हो गये और तब वानरों ने अपना नया जन्म समझा। हनुमानजी का मुख प्रसन्न था और शरीर में तेज विराजमान था, [जिससे उन्होंने समझ लिया कि] ये श्रीरामचन्द्रजी का कार्य कर आये हैं।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥ पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥ २ ॥
अर्थ:
सब ने आकर सुग्रीव के चरणों में सिर नवाया। कपिराज सुग्रीव सभी से बड़े प्रेम के साथ मिले। उन्होंने कुशल पूछी, [तब वानरों ने उत्तर दिया--] आपके चरणों के दर्शन से सब कुशल है। श्रीरामजी की कृपा से विशेष कार्य हुआ (कार्य में विशेष सफलता हुई है)।
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥ कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥ ४ ॥
अर्थ:
वे चरित्र सुनने पर कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजी के मन को बहुत ही अच्छे लगे। उन्होंने हर्षित होकर हनुमानजी को फिर हृदय से लगा लिया और कहा-हे तात! कहो, सीता किस प्रकार रहती और अपने प्राणों की रक्षा करती हैं ?
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥ मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥ २ ॥
अर्थ:
छोटे भाई समेत प्रभु के चरण पकड़ना [और कहना कि] आप दीनबन्धु हैं, शरणागत के दुःखों को हरनेवाले हैं और मैं मन, वचन और कर्म से आपके चरणों की अनुरागिणी हूँ। फिर स्वामी (आप) ने मुझे किस अपराध से त्याग दिया ?।
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥ नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥ ४ ॥
अर्थ:
विरह अग्नि है, शरीर रूई है और श्वास पवन है; इस प्रकार [अग्नि और पवन का संयोग होने से] यह शरीर क्षणमात्र में जल सकता है। परन्तु नेत्र अपने हित के लिए (प्रभु का स्वरूप देखकर सुखी होने के लिए) जल (आँसू) बरसाते हैं, जिससे विरह की आग से भी देह जलने नहीं पाती।
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥ बचन कायँ मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥ १ ॥
अर्थ:
सीताजी का दुःख सुनकर सुख के धाम प्रभु के कमलनेत्रों में जल भर आया [और वे बोले--] मन, वचन और शरीर से जिसे मेरी ही गति (मेरा ही आश्रय) है, उसे क्या स्वप्न में भी विपत्ति हो सकती है ?।
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥ प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥ ३ ॥
अर्थ:
[ भगवान् कहने लगे--] हे हनुमान्! सुन; तेरे समान मेरा उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है। मैं तेरा प्रत्युपकार तो क्या करूँ, मेरा मन भी तेरे सामने नहीं हो सकता।
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥ पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥ ४ ॥
अर्थ:
हे पुत्र! सुन; मैंने मन में [खूब] विचार करके देख लिया कि मैं तुझसे उऋण नहीं हो सकता। देवताओं के रक्षक प्रभु बार-बार हनुमानजी को देख रहे हैं। नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल भरा है और शरीर अत्यन्त पुलकित है।
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥ प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥ १ ॥
अर्थ:
प्रभु उनको बार-बार उठाना चाहते हैं, परन्तु प्रेम में डूबे हुए हनुमानजी को चरणों से उठना सुहाता नहीं। प्रभु का कर-कमल हनुमानजी के सिर पर है। उस स्थिति का स्मरण करके शिवजी प्रेममग्न हो गये।