श्रीरामजी का वानरों की सेना के साथ चलकर समुद्र तट पर पहुँचना

सीताजी का समाचार पाकर श्रीरामजी वानर सेना के साथ लंका की ओर प्रस्थान करते हैं। चलते-चलते वे समुद्र तट पर पहुँचकर आगे की तैयारी करते हैं।

सुन्दरकाण्ड · प्रकरण १३ / २०

प्रकरण पाठ

चौपाई

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥ देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥ १ ॥

अर्थ:

वे प्रभु के चरणकमलों में सिर नवाते हैं। महान् बलवान् रीछ और वानर गरज रहे हैं। श्रीरामजी ने वानरों की सारी सेना देखी। तब कमलनेत्रों से कृपापूर्वक उनकी ओर दृष्टि डाली।

चौपाई

राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥ हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥ २ ॥

अर्थ:

राम कृपा का बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंखवाले बड़े पर्वत हो गये। तब श्रीरामजी ने हर्षित होकर प्रस्थान (कूच) किया। अनेक सुन्दर और शुभ शकुन हुए।

चौपाई

जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥ प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

जिनकी कीर्ति सब मंगलों से पूर्ण है, उनके प्रस्थान के समय शकुन होना, यह नीति है (लीला की मर्यादा है)। प्रभु का प्रस्थान जानकीजी ने भी जान लिया। उनके बायें अंग फड़क-फड़ककर मानो कहे देते थे [कि श्रीरामजी आ रहे हैं]।

चौपाई

जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई॥ चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥ ४ ॥

अर्थ:

जानकीजी को जो-जो शकुन होते थे, वही-वही रावण के लिए अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है? असंख्य वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं।

चौपाई

नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥ केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥ ५ ॥

अर्थ:

नख ही जिनके शस्त्र हैं, वे इच्छानुसार (सर्वत्र बेरोक-टोक) चलनेवाले रीछ-वानर पर्वतों और वृक्षों की धारण किए कोई आकाशमार्ग से और कोई पृथ्वी पर चले जा रहे हैं। वे सिंह के समान गर्जना कर रहे हैं। [उनके चलने और गर्जने से] दिशाओं के हाथी विचलित होकर चिग्घाड़ रहे हैं।

छन्द

चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे। मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥ कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं। जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥ १ ॥

अर्थ:

दिशाओं के हाथी चिग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत चंचल हो गये (काँपने लगे) और समुद्र खलबला उठे। गन्धर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सबके सब मन में हर्षित हुए कि [अब] हमारे दुःख टल गये। अनेकों करोड़ भयानक वानर योद्धा कटकटा रहे हैं और करोड़ों ही दौड़ रहे हैं। 'जय राम, प्रबल प्रताप कोसलनाथ श्रीरामचन्द्रजी की जय हो' ऐसा पुकारते हुए वे उनके गुणगण गा रहे हैं।

छन्द

सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई। गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई॥ रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी। जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥ २ ॥

अर्थ:

उदार (परम श्रेष्ठ एवं महान्) सर्पराज शेषजी भी सेना का बोझ नहीं सह सकते, वे बार-बार मोहित हो जाते (घबड़ा जाते) हैं और पुनः-पुनः कच्छप की कठोर पीठ को दाँतों से पकड़ते हैं। ऐसा करते (अर्थात् बार-बार दाँतों को गड़ाकर कच्छप की पीठ पर लकीर-सी खींचते हुए) वे कैसे शोभा दे रहे हैं मानो श्रीरामचन्द्रजी की सुन्दर प्रस्थानयात्रा को परम सुहावनी जानकर उसकी अचल पवित्र कथा को सर्पराज शेषजी कच्छप की पीठ पर लिख रहे हों।

दोहा

एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर। जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥ ३५ ॥

अर्थ:

इस प्रकार कृपानिधान श्रीरामजी समुद्रतट पर जा उतरे। अनेकों रीछ-वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे।