नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी
चौपाई ३, दोहा ३० के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥ पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥ ३ ॥
अर्थ
हे नाथ! पवनपुत्र हनुमानजी ने जो करनी की, उसका हजारों मुखों से भी वर्णन नहीं किया जा सकता। तब जाम्बवान ने हनुमानजी के सुन्दर चरित्र (कार्य) श्रीरघुनाथजी को सुनाये।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “हनुमानजी का लौटना और राम को संदेश” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी का समुद्र पार लौटना, मधुवन प्रवेश, सुग्रीव मिलन और श्रीराम को सीता का संदेश व चूड़ामणि अर्पण का वर्णन है।
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हनुमानजी का लौटना और राम को संदेश