लंका जलाने के बाद हनुमानजी का सीताजी से विदा माँगना और चूड़ामणि पाना
लंका दहन के बाद हनुमानजी पुनः सीताजी के पास जाकर उनसे विदा लेते हैं। सीताजी उन्हें चूड़ामणि देकर श्रीरामजी के लिए अपना स्नेहपूर्ण संदेश सौंपती हैं।
सुन्दरकाण्ड · प्रकरण ११ / २०
प्रकरण पाठ
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥ दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥ २ ॥
अर्थ:
[जानकीजी ने कहा--] हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना और इस प्रकार कहना-हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकार से पूर्णकाम हैं (आपको किसी प्रकार की कामना नहीं है), तथापि दीनों (दुखियों) पर दया करना आपका विरद है [और मैं दीन हूँ], अतः उस विरद को याद करके, हे नाथ! मेरे भारी संकट को दूर कीजिये।