लंका जलाने के बाद हनुमानजी का सीताजी से विदा माँगना और चूड़ामणि पाना

लंका दहन के बाद हनुमानजी पुनः सीताजी के पास जाकर उनसे विदा लेते हैं। सीताजी उन्हें चूड़ामणि देकर श्रीरामजी के लिए अपना स्नेहपूर्ण संदेश सौंपती हैं।

सुन्दरकाण्ड · प्रकरण ११ / २०

प्रकरण पाठ

चौपाई

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥ चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥ १ ॥

अर्थ:

[हनुमानजी ने कहा--] हे माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान) दीजिये, जैसे श्रीरघुनाथजी ने मुझे दिया था। तब सीताजी ने चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमानजी ने उसको हर्षपूर्वक ले लिया।

चौपाई

कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥ दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥ २ ॥

अर्थ:

[जानकीजी ने कहा--] हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना और इस प्रकार कहना-हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकार से पूर्णकाम हैं (आपको किसी प्रकार की कामना नहीं है), तथापि दीनों (दुखियों) पर दया करना आपका विरद है [और मैं दीन हूँ], अतः उस विरद को याद करके, हे नाथ! मेरे भारी संकट को दूर कीजिये।

चौपाई

तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥ मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥ ३ ॥

अर्थ:

हे तात! इन्द्रपुत्र जयन्त की कथा (घटना) सुनाना और प्रभु को उनके बाण का प्रताप समझाना [स्मरण कराना]। यदि एक मास में नाथ न आये, तो फिर मुझे जीवित न पायेंगे।

चौपाई

कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥ तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥ ४ ॥

अर्थ:

हे हनुमान्! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ! हे तात! तुम भी अब जाने को कह रहे हो। तुम्हें देखकर छाती ठंडी हुई थी। फिर मुझे वही दिन और वही रात!

दोहा

जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह। चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥ २७ ॥

अर्थ:

हनुमानजी ने जानकीजी को समझाकर बहुत प्रकार से धीरज दिया और उनके चरणकमलों में सिर नवाकर श्रीरामजी के पास गमन किया।