सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं

चौपाई ४, दोहा ३२ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥ पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥ ४ ॥

अर्थ

हे पुत्र! सुन; मैंने मन में [खूब] विचार करके देख लिया कि मैं तुझसे उऋण नहीं हो सकता। देवताओं के रक्षक प्रभु बार-बार हनुमानजी को देख रहे हैं। नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल भरा है और शरीर अत्यन्त पुलकित है।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “हनुमानजी का लौटना और राम को संदेश” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी का समुद्र पार लौटना, मधुवन प्रवेश, सुग्रीव मिलन और श्रीराम को सीता का संदेश व चूड़ामणि अर्पण का वर्णन है।

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हनुमानजी का लौटना और राम को संदेश