ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं

दोहा ३३ · सुन्दरकाण्ड

दोहा पाठ

ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल। तब प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥ ३३ ॥

अर्थ

हे प्रभु! जिस पर आप प्रसन्न हों, उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं है। आपके प्रभाव से रूई [जो स्वयं बहुत जल्दी जल जानेवाली वस्तु है] बड़वानल को निश्चय ही जला सकती है (अर्थात्‌ असम्भव भी सम्भव हो सकता है)।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “हनुमानजी का लौटना और राम को संदेश” प्रकरण का दोहा ३३ है। इस प्रकरण में हनुमानजी का समुद्र पार लौटना, मधुवन प्रवेश, सुग्रीव मिलन और श्रीराम को सीता का संदेश व चूड़ामणि अर्पण का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
हनुमानजी का लौटना और राम को संदेश