बिरह अगिनि तनु तूल समीरा
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा
चौपाई ४, दोहा ३१ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥ नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥ ४ ॥
अर्थ
विरह अग्नि है, शरीर रूई है और श्वास पवन है; इस प्रकार [अग्नि और पवन का संयोग होने से] यह शरीर क्षणमात्र में जल सकता है। परन्तु नेत्र अपने हित के लिए (प्रभु का स्वरूप देखकर सुखी होने के लिए) जल (आँसू) बरसाते हैं, जिससे विरह की आग से भी देह जलने नहीं पाती।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “हनुमानजी का लौटना और राम को संदेश” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी का समुद्र पार लौटना, मधुवन प्रवेश, सुग्रीव मिलन और श्रीराम को सीता का संदेश व चूड़ामणि अर्पण का वर्णन है।
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हनुमानजी का लौटना और राम को संदेश