दस दिसि रहे बान नभ छाई
दस दिसि रहे बान नभ छाई
चौपाई २, दोहा ७३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहुँ मघा मेघ झरि लाई॥ धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना॥ २ ॥
अर्थ
आकाश में दसों दिशाओं में बाण छा गये, मानो मघा नक्षत्र के बादलों ने झड़ी लगा दी हो। “पकड़ो, पकड़ो, मारो” ये शब्द कानों से सुनायी पड़ते हैं। पर जो मार रहा है उसे कोई नहीं जान पाता।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मेघनाद का राम को नागपाश में बाँधना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मेघनाद के मायावी युद्ध और रामजी के लीला से नागपाश में बँधने का वर्णन है।
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मेघनाद का राम को नागपाश में बाँधना