गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं
गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं
चौपाई ३, दोहा ७३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहिं तेहि न दुखित फिरि आवहिं॥ अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर॥ ३ ॥
अर्थ
पर्वत और वृक्षों को लेकर वानर आकाश में दौड़ते हैं। पर उसे देख नहीं पाते, इससे दुखी होकर लौट आते हैं-मेघनाद ने मायाबल से अटपटी घाटियों, रास्तों और पर्वत-कन्दराओं को बाणों के पिंजरे बना दिये (बाणों से छा दिया)।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मेघनाद का राम को नागपाश में बाँधना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ७३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मेघनाद के मायावी युद्ध और रामजी के लीला से नागपाश में बँधने का वर्णन है।
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मेघनाद का राम को नागपाश में बाँधना