हित मत तोहि न लागत कैसें
हित मत तोहि न लागत कैसें
चौपाई ३, दोहा १० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
हित मत तोहि न लागत कैसें। काल बिबस कहुँ भेषज जैसें॥ संध्या समय जानि दससीसा। भवन चलेउ निरखत भुज बीसा॥ ३ ॥
अर्थ
हित की सलाह आपको कैसे नहीं लगती (आप पर कैसे असर नहीं करती), जैसे मृत्यु के वश हुए [रोगी] को दवा नहीं लगती। सन्ध्या का समय जानकर रावण अपनी बीसों भुजाओं को देखता हुआ महल को चला।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मंदोदरी का रावण को उपदेश” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मंदोदरी द्वारा रावण को सीता-वापसी का उपदेश और रावण-प्रहस्त संवाद का वर्णन है।
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मंदोदरी का रावण को उपदेश