कर गहि पतिहि भवन निज आनी

चौपाई २, दोहा ६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

कर गहि पतिहि भवन निज आनी। बोली परम मनोहर बानी॥ चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा। सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा॥ २ ॥

अर्थ

[तब] वह हाथ पकड़कर, पति को अपने महल में लाकर परम मनोहर वाणी बोली। चरणों में सिर नवाकर उसने अपना आँचल पसारा और कहा--हे प्रियतम! क्रोध त्यागकर मेरा वचन सुनिये।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “मंदोदरी का रावण को उपदेश” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मंदोदरी द्वारा रावण को सीता-वापसी का उपदेश और रावण-प्रहस्त संवाद का वर्णन है।

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मंदोदरी का रावण को उपदेश