जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा

चौपाई १, दोहा ८१ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा॥ अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा॥ १ ॥

अर्थ

हे मुनीशों! यदि आप पहले मिलते, तो मैं आपका उपदेश सिर-माथे रखकर सुनती। परंतु अब तो मैं अपना जन्म शिवजी के लिए हार चुकी। फिर गुण-दोषों का विचार कौन करे?

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वती” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ८१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सप्तर्षियों द्वारा पार्वतीजी की निष्ठा-परीक्षा और उनकी अडिग भक्ति एवं महिमा का वर्णन है।

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सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वती