नारद बचन न मैं परिहरऊँ
नारद बचन न मैं परिहरऊँ
चौपाई ४, दोहा ८० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ॥ गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥ ४ ॥
अर्थ
अतः मैं नारदजी के वचनों को नहीं छोड़ूँगी; चाहे घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती। जिसे गुरु के वचनों में विश्वास नहीं है, उसे सपने में भी सुख और सिद्धि सहज नहीं होती।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वती” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ८० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सप्तर्षियों द्वारा पार्वतीजी की निष्ठा-परीक्षा और उनकी अडिग भक्ति एवं महिमा का वर्णन है।
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सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वती