जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी
जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी
चौपाई २, दोहा ८१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी॥ तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं॥ २ ॥
अर्थ
यदि आपके हृदय में बहुत ही हठ है और विवाह की बातचीत किए बिना आपसे रहा ही नहीं जाता, तो संसार में वर-कन्याएँ बहुत हैं। खिलवाड़ करने वालों को आलस्य तो होता नहीं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वती” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ८१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सप्तर्षियों द्वारा पार्वतीजी की निष्ठा-परीक्षा और उनकी अडिग भक्ति एवं महिमा का वर्णन है।
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सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वती