अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख

दोहा ७९ · बालकाण्ड

दोहा पाठ

अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं। सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं॥ ७९ ॥

अर्थ

अब शिव को कोई चिन्ता नहीं रही, भीख माँगकर खा लेते हैं और सुख से सोते हैं। ऐसे स्वभाव से ही अकेले रहने वालों के घर भला क्या कभी स्त्रियाँ टिक सकती हैं?

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वती” प्रकरण का दोहा ७९ है। इस प्रकरण में सप्तर्षियों द्वारा पार्वतीजी की निष्ठा-परीक्षा और उनकी अडिग भक्ति एवं महिमा का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वती