पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं
पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं
चौपाई ३, दोहा २५८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं॥ कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा॥ ३ ॥
अर्थ
फिर हे गोसाई! आप जिसको जैसा कहेंगे वह सब तरह से सेवामें घट जायगा (आज्ञापालन करेगा)। मुनि वसिष्ठजी कहने लगे—हे राम! तुमने सच कहा। पर भरत के स्नेह ने विचार को नहीं रहने दिया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीवसिष्ठजी का भाषण” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २५८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट की सभा में वसिष्ठजी द्वारा धर्म, मर्यादा और भरत-भक्ति पर दिए गए मार्गदर्शक वचनों का वर्णन है।
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श्रीवसिष्ठजी का भाषण