बोले गुर आयस अनुकूला
बोले गुर आयस अनुकूला
चौपाई २, दोहा २५९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
बोले गुर आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगलमूला॥ नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई॥ २ ॥
अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी गुरु की आज्ञा के अनुकूल मनोहर, कोमल और कल्याण के मूल वचन बोले—हे नाथ! आपकी सौगन्ध और पिताजी के चरणों की दुहाई है (मैं सत्य कहता हूँ कि) विश्व भर में भरत के समान भाई कोई हुआ ही नहीं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीवसिष्ठजी का भाषण” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २५९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट की सभा में वसिष्ठजी द्वारा धर्म, मर्यादा और भरत-भक्ति पर दिए गए मार्गदर्शक वचनों का वर्णन है।
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श्रीवसिष्ठजी का भाषण