तात बात फुरि राम कृपाहीं

चौपाई १, दोहा २५६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं॥ सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता॥ १ ॥

अर्थ

हे तात! बात सत्य है, पर है रामजी की कृपा से ही। रामविमुख को तो स्वप्न में भी सिद्धि नहीं मिलती। हे तात! मैं एक बात कहने में सकुचाता हूँ। बुद्धिमान् लोग सर्वस्व जाता देखकर [आधे की रक्षाके लिये] आधा छोड़ दिया करते हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीवसिष्ठजी का भाषण” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २५६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट की सभा में वसिष्ठजी द्वारा धर्म, मर्यादा और भरत-भक्ति पर दिए गए मार्गदर्शक वचनों का वर्णन है।

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श्रीवसिष्ठजी का भाषण