तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई

चौपाई २, दोहा २५६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई॥ सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता॥ २ ॥

अर्थ

अतः तुम दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) वन को जाओ और लक्ष्मण, सीता और रघुराई को लौटा दिया जाय। ये सुन्दर वचन सुनकर दोनों भाई हर्षित हो गये। उनके सारे अंग परमानन्द से परिपूर्ण हो गये।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीवसिष्ठजी का भाषण” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २५६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट की सभा में वसिष्ठजी द्वारा धर्म, मर्यादा और भरत-भक्ति पर दिए गए मार्गदर्शक वचनों का वर्णन है।

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श्रीवसिष्ठजी का भाषण