तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी

चौपाई ४, दोहा २५८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी॥ मोरें जान भरत रुचि राखी। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी॥ ४ ॥

अर्थ

इसी लिये मैं बार-बार कहता हूँ, मेरी बुद्धि भरत की भक्ति के वश हो गयी है। मेरी समझ में तो भरत की रुचि रखकर जो कुछ किया जायगा, शिवजी साक्षी हैं, वह सब शुभ ही होगा।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीवसिष्ठजी का भाषण” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २५८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट की सभा में वसिष्ठजी द्वारा धर्म, मर्यादा और भरत-भक्ति पर दिए गए मार्गदर्शक वचनों का वर्णन है।

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श्रीवसिष्ठजी का भाषण