बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब

दोहा २५५ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु। सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु॥ २५५ ॥

अर्थ

अब आप मुझ से उपाय पूछते हैं, यह सब मेरा अभाग्य है। भरतजी के स्नेहमय वचनों को सुनकर गुरुजी के हृदय में अनुराग उमड़ आया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीवसिष्ठजी का भाषण” प्रकरण का दोहा २५५ है। इस प्रकरण में चित्रकूट की सभा में वसिष्ठजी द्वारा धर्म, मर्यादा और भरत-भक्ति पर दिए गए मार्गदर्शक वचनों का वर्णन है।

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श्रीवसिष्ठजी का भाषण