सब सादर सुनि मुनिबर बानी
सब सादर सुनि मुनिबर बानी
चौपाई २, दोहा २५५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी॥ उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे॥ २ ॥
अर्थ
मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी की नीति, परमार्थ और स्वार्थ (लौकिक हित) में सनी हुई वाणी सब ने आदरपूर्वक सुनी। पर किसी को कोई उत्तर नहीं आता, सब लोग भोले (विचारशक्ति से रहित) हो गये। तब भरत ने सिर नवाकर हाथ जोड़े।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीवसिष्ठजी का भाषण” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट की सभा में वसिष्ठजी द्वारा धर्म, मर्यादा और भरत-भक्ति पर दिए गए मार्गदर्शक वचनों का वर्णन है।
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श्रीवसिष्ठजी का भाषण