सब के उर अंतर बसहु जानहु
सब के उर अंतर बसहु जानहु
दोहा २५७ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ। पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ॥ २५७ ॥
अर्थ
आप सबके हृदय के भीतर बसते हैं और सब के भले-बुरे भाव को जानते हैं। जिसमें पुरवासियों का, माताओं का और भरत का हित हो, वही उपाय बतलाइये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीवसिष्ठजी का भाषण” प्रकरण का दोहा २५७ है। इस प्रकरण में चित्रकूट की सभा में वसिष्ठजी द्वारा धर्म, मर्यादा और भरत-भक्ति पर दिए गए मार्गदर्शक वचनों का वर्णन है।
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श्रीवसिष्ठजी का भाषण