जे गुर पद अंबुज अनुरागी
जे गुर पद अंबुज अनुरागी
चौपाई ३, दोहा २५९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी॥ राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू॥ ३ ॥
अर्थ
जो लोग गुरु के चरणकमलों के अनुरागी हैं, वे लोक में (लौकिक दृष्टि से) भी और वेद में (पारमार्थिक दृष्टि से) भी बड़भागी होते हैं! [फिर] जिस पर आप (गुरु) का ऐसा स्नेह है, उस भरत के भाग्य को कौन कह सकता है ?।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीवसिष्ठजी का भाषण” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २५९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट की सभा में वसिष्ठजी द्वारा धर्म, मर्यादा और भरत-भक्ति पर दिए गए मार्गदर्शक वचनों का वर्णन है।
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श्रीवसिष्ठजी का भाषण