भरत बचन सुनि देखि सनेहू

चौपाई १, दोहा २५७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू॥ भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी॥ १ ॥

अर्थ

भरतजी के वचन सुनकर और उनका प्रेम देखकर सारी सभासहित मुनि वसिष्ठजी विदेह हो गये (किसी को अपने देह की सुधि न रही)। भरतजी की महान्‌ महिमा समुद्र है, मुनि की बुद्धि उसके तट पर अबला स्त्री के समान खड़ी है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीवसिष्ठजी का भाषण” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २५७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट की सभा में वसिष्ठजी द्वारा धर्म, मर्यादा और भरत-भक्ति पर दिए गए मार्गदर्शक वचनों का वर्णन है।

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श्रीवसिष्ठजी का भाषण