आरत कहहिं बिचारि न काऊ
आरत कहहिं बिचारि न काऊ
चौपाई १, दोहा २५८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जुआरिहि आपन दाऊ॥ सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ॥ १ ॥
अर्थ
आर्त (दुखी) लोग कभी विचार कर नहीं कहते। जुआरी को अपना ही दाँव सूझता है। मुनि के वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे—हे नाथ! उपाय तो आप ही के हाथ है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीवसिष्ठजी का भाषण” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २५८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट की सभा में वसिष्ठजी द्वारा धर्म, मर्यादा और भरत-भक्ति पर दिए गए मार्गदर्शक वचनों का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
श्रीवसिष्ठजी का भाषण