गा चह पार जतनु हियँ हेरा
गा चह पार जतनु हियँ हेरा
चौपाई २, दोहा २५७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा॥ औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई॥ २ ॥
अर्थ
वह [उस समुद्र के] पार जाना चाहती है, इसके लिये उसने हृदय में उपाय भी ढूँढ़े! पर [उसे पार करने का साधन] नाव, जहाज या बेड़ा कुछ भी नहीं पाती। भरतजी की बड़ाई और कौन करेगा? तलैया की सीपी में भी कहीं समुद्र समा सकता है?
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीवसिष्ठजी का भाषण” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २५७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट की सभा में वसिष्ठजी द्वारा धर्म, मर्यादा और भरत-भक्ति पर दिए गए मार्गदर्शक वचनों का वर्णन है।
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श्रीवसिष्ठजी का भाषण